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mahabharat 13.14.d178: मैं वह चेतन आत्मा हूँ जो बोलता है, चिंतन करता है, आनंद लेता है, सूँघता है, देखता है और दिखाता है, समझता है और समझाता है, और जानता है और सुनता है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d178
 
 
श्लोक  13.14.d178 
वक्ता मन्ता रसयिता घ्राता द्रष्टा प्रदर्शक:।
बोद्धा बोद्धयिता चाहं गन्ता श्रोता चिदात्मक:॥
 
 
अनुवाद
मैं वह चेतन आत्मा हूँ जो बोलता है, चिंतन करता है, आनंद लेता है, सूँघता है, देखता है और दिखाता है, समझता है और समझाता है, और जानता है और सुनता है।
 
I am the conscious soul who speaks, contemplates, enjoys, smells, sees and shows, understands and explains, and knows and listens.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)