श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d169
 
 
श्लोक  13.14.d169 
शास्त्रदृष्टविधानज्ञा असक्ता: क्वचिदन्यथा॥
शक्योऽहं वेदितुं तैस्तु यन्मे परममव्ययम्।
 
 
अनुवाद
जो लोग शास्त्रविधि को जानते हैं, आसक्तिरहित होकर शुभ कर्म करते हैं तथा शास्त्रविरुद्ध पाप कर्मों में कभी प्रवृत्त नहीं होते, वे ही मुझे जान सकते हैं। वे ही मेरे सनातन और परम तत्त्व को जान सकते हैं।
 
Only those who are aware of the rules prescribed in the scriptures and perform good deeds without attachment and never indulge in bad deeds contrary to the scriptures can know me. Only they can know my eternal and supreme essence.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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