श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d168
 
 
श्लोक  13.14.d168 
ये त्वग्निहोत्रनियता जपयज्ञपरायणा:॥
ये मामुपासते शश्वदेतांस्त्वं दृष्टवानसि।
 
 
अनुवाद
जो अग्निहोत्र और जप-यज्ञ में तत्पर रहते हैं, जो निरन्तर मेरी पूजा करते हैं, उनको तुमने प्रत्यक्ष देखा है।
 
You have seen directly those who are devoted to Agnihotra and Japa-Yagya, who worship me constantly.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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