श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d166
 
 
श्लोक  13.14.d166 
अहिंसा सर्वभूतेषु तेष्ववस्थितमार्जवम्॥
तेष्वेव च समाधाय सम्यगेति स मामजम्।
 
 
अनुवाद
वह समस्त जीवों के प्रति अहिंसा की भावना रखता है, उसमें 'सरलता' नामक सद्गुण की स्थिति होती है और जो उन गुणों में स्थित होकर मुझ परमात्मा में अपने मन को पूर्णतः एकाकार कर देता है, वह मुझ अजन्मा परमात्मा को प्राप्त होता है।
 
He has a feeling of non-violence towards all living beings, he has the state of virtue called 'simplicity' and the one who, being situated in those qualities, completely integrates his mind in me, God, attains me as the unborn God.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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