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mahabharat 13.14.d163: जो समस्त आसक्तियों से मुक्त है, वह अनन्य भक्ति से मुझमें मन को एकाग्र कर सकता है और ज्ञान-दृष्टि से मेरा दर्शन कर सकता है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d163
 
 
श्लोक  13.14.d163 
सर्वतो मुक्तसङ्गेन मय्यनन्यसमाधिना।
शक्य: समासादयितुमहं वै ज्ञानचक्षुषा॥
 
 
अनुवाद
जो समस्त आसक्तियों से मुक्त है, वह अनन्य भक्ति से मुझमें मन को एकाग्र कर सकता है और ज्ञान-दृष्टि से मेरा दर्शन कर सकता है।
 
He who is free from all attachments can concentrate his mind on me with exclusive devotion and have a vision of me with the sight of knowledge.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)