श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d160
 
 
श्लोक  13.14.d160 
मया सर्वमिदं व्याप्तं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम्॥
अहं सर्वजगद्‍बीजं सर्वत्रगतिरव्यय:।
 
 
अनुवाद
मैं इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हूँ। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मुझमें स्थित है। मैं सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का बीज हूँ। मेरी सर्वत्र गति है और मैं अविनाशी हूँ।
 
I have pervaded this entire universe. The entire universe is established in me. I am the seed of the entire universe. I have movement everywhere and I am indestructible.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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