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mahabharat 13.14.d158: तीसरी मूर्ति चल-अचल जगत का नाश करती है और चौथी मूर्ति आत्मस्वरूप है, जो आसुरी शक्तियों को माया से मोहित कर उनका नाश करती है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d158
 
 
श्लोक  13.14.d158 
सृष्टं संहरते चैका जगत‍् स्थावरजङ्गमम्।
जातात्मनिष्ठा क्षपयन् मोहयन्निव मायया॥
 
 
अनुवाद
तीसरी मूर्ति चल-अचल जगत का नाश करती है और चौथी मूर्ति आत्मस्वरूप है, जो आसुरी शक्तियों को माया से मोहित कर उनका नाश करती है।
 
The third idol destroys the movable and immovable world and the fourth idol is self-oriented, which fascinates the demonic powers with illusion and destroys them.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)