श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d157
 
 
श्लोक  13.14.d157 
एका मूर्तिर्निर्गुणाख्या योगं परममास्थिता।
द्वितीया सृजते तात भूतग्रामं चराचरम्॥
 
 
अनुवाद
पिता जी! मेरा एक निराकार रूप है जो परम योग के आश्रय में रहता है। दूसरा रूप वह है जो जड़-चेतन जीवों के समुदाय की रचना करता है।
 
Father! I have a formless form which lives under the shelter of supreme yoga. The other form is that which creates the community of animate and inanimate living beings.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas