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mahabharat 13.14.d155-d156: मैं स्वयं को चार रूपों में विभाजित करके, विश्व कल्याण हेतु तत्पर होकर विचरण करता रहता हूँ। मैं सम्पूर्ण विश्व के जीवित और सुरक्षित रहने के लिए नियम बनाता हूँ। आप सभी को उनके वास्तविक रूप में सुनने का अधिकार है।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d155-d156
 
 
श्लोक  13.14.d155-d156 
चतुर्धाहं विभक्तात्मा चरामि जगतो हित:॥
लोकानां धारणार्थाय विधानं विदधामि च।
यथावत्तदशेषेण श्रोतुमर्हति मे भवान्॥
 
 
अनुवाद
मैं स्वयं को चार रूपों में विभाजित करके, विश्व कल्याण हेतु तत्पर होकर विचरण करता रहता हूँ। मैं सम्पूर्ण विश्व के जीवित और सुरक्षित रहने के लिए नियम बनाता हूँ। आप सभी को उनके वास्तविक रूप में सुनने का अधिकार है।
 
I divide myself into four forms and keep moving around, ready to serve the welfare of the world. I make laws to ensure that the entire world remains alive and safe. You are entitled to hear all of them in their true form.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)