श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d154
 
 
श्लोक  13.14.d154 
निराहारा ह्यनिष्यन्दाश्चन्द्रांशुसदृशप्रभा:।
निर्मला निरहंकारा निरालम्बा निराशिष:॥
मद्भक्ता: सततं ते वै भक्तस्तानपि चाप्यहम्।
 
 
अनुवाद
उनका शरीर चन्द्रमा की किरणों के समान चमकता है। वे निराहार, निराहार, शुद्ध, अहंकाररहित, आधारहीन और कामनारहित हैं। मुझमें उनकी भक्ति सदैव बनी रहती है और मैं भी उनका भक्त (प्रेमी) बना रहता हूँ।
 
His body glows like the rays of the moon. He is without food, without fatigue, pure, devoid of ego, without support and without any desire. His devotion towards me always remains and I also remain his devotee (lover).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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