श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d152-d153
 
 
श्लोक  13.14.d152-d153 
ये मया भावितात्मानो मय्येवाभिरता: सदा॥
उपासते च मामेव ज्योतिर्भूता निरामया:।
तैर्हि तत्रैव वस्तव्यं नीरागात्मभिरच्युतै:॥
 
 
अनुवाद
जिनका अन्तःकरण मेरा चिन्तन करके शुद्ध हो गया है, जो निरन्तर मेरी पूजा में तत्पर रहते हैं, वे ही रोग और शोक से मुक्त होकर ज्योतिस्वरूप होकर वहाँ मेरी पूजा करते हैं। वे कभी अपनी मर्यादा से विचलित नहीं होते और सदैव अनासक्त हृदय से वहीं निवास करते हैं।
 
Those whose conscience has become pure by thinking of me, who are always engaged in worshipping me, they are the ones who worship me there, free from disease and sorrow and being in the form of light. They will never deviate from their limits and will always reside there with a detached heart.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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