श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d143
 
 
श्लोक  13.14.d143 
मां तु ज्ञातुं कृता बुद्धिर्भवता पक्षिसत्तम।
शृणु योऽहं यतश्चाहं यदर्थं चाहमुद्यत:॥
 
 
अनुवाद
हे महान पक्षी! तूने मेरा स्वरूप जानने का विचार किया था; तो मैं कौन हूँ? मैं कहाँ से आया हूँ? और किस उद्देश्य से निकला हूँ? मैं तुझे यह सब बताता हूँ, सुन।
 
O great bird! You had thought of knowing my essence; so who am I? Where have I come from? And for what purpose have I set out? I will tell you all this, listen.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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