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mahabharat 13.14.d140: मैं ही वह परम पुरुष हूँ जो मेरा परम गुप्त रूप है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। मैं ही सबका अविनाशी कारण हूँ।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d140
 
 
श्लोक  13.14.d140 
यत् तु मे परमं गुह्यं येन व्याप्तमिदं जगत‍्।
सोऽहं गत: सर्वसत्त्व: सर्वस्य प्रभवोऽप्यय:॥
 
 
अनुवाद
मैं ही वह परम पुरुष हूँ जो मेरा परम गुप्त रूप है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत व्याप्त है। मैं ही सबका अविनाशी कारण हूँ।
 
I am that Supreme Being who is my most secret form and by whom this entire universe is pervaded. I am the indestructible cause of everything.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)