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mahabharat 13.14.d138: मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित सनातन आत्मा हूँ, जिसका प्रकृति और आत्मा के तत्त्व को जानने वाले लोग अनेक कारणों से साक्षात्कार करते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d138
 
 
श्लोक  13.14.d138 
य: स्वभावात्मतत्त्वज्ञै: कारणैरुपलक्ष्यते।
अनादिमध्यनिधन: सोऽन्तरात्मास्मि शाश्वत:॥
 
 
अनुवाद
मैं आदि, मध्य और अन्त से रहित सनातन आत्मा हूँ, जिसका प्रकृति और आत्मा के तत्त्व को जानने वाले लोग अनेक कारणों से साक्षात्कार करते हैं।
 
I am the eternal soul without beginning, middle and end, whom the people who know the essence of nature and soul, encounter through various reasons.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)