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mahabharat 13.14.d137: मनुष्य जो भी पवित्र, धार्मिक और उत्तम विचार कल्याण की भावना से करता है, मैं रोग-मुक्त ईश्वर हूँ।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d137
 
 
श्लोक  13.14.d137 
यत् किंचिच्छ्रेयसा युक्त: श्रेष्ठभावं व्यवस्यति।
धर्मयुक्तं च पुण्यं च सोऽहमस्मि निरामय:॥
 
 
अनुवाद
मनुष्य जो भी पवित्र, धार्मिक और उत्तम विचार कल्याण की भावना से करता है, मैं रोग-मुक्त ईश्वर हूँ।
 
Whatever sacred, righteous and noble thought a man decides upon with a feeling of well-being, I am the disease-free God.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)