श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d135-d136
 
 
श्लोक  13.14.d135-d136 
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्।
मनो बुद्धिश्च तेजश्च तम: सत्त्वं रजस्तथा॥
प्रकृतिर्विकृतिश्चेति विद्याविद्ये शुभाशुभे।
मत्त एतानि जायन्ते नाहमेभ्य: कथंचन॥
 
 
अनुवाद
पृथ्वी, वायु, आकाश, जल, अग्नि, मन, बुद्धि, तेज (अहंकार), सत्वगुण, रजोगुण और तमोगुण, प्रकृति, विकार, विद्या, अविद्या तथा शुभ-अशुभ - ये सब मुझसे ही उत्पन्न होते हैं। मैं इनसे किसी भी प्रकार उत्पन्न नहीं होता।
 
Earth, air, sky, water, fire, mind, intelligence, brilliance (ego), sattva guna, rajo guna and tamo guna, nature, distortion, knowledge, ignorance and auspicious and inauspicious - all these arise from me only. I am not born from these in any way.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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