श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d134
 
 
श्लोक  13.14.d134 
चतुर्धाहं विभक्तात्मा लोकानां हितकाम्यया।
भूतभव्यभविष्यादिरनादिर्विश्वकृत्तम:॥
 
 
अनुवाद
लोकों के कल्याण के लिए मैंने स्वयं को चार रूपों में विभाजित किया है। मैं भूत, वर्तमान और भविष्य का आदि हूँ। मेरा कोई आदि नहीं है। मैं ब्रह्मांड का सबसे महान रचयिता हूँ।
 
For the welfare of the worlds, I have divided myself into four forms. I am the beginning of the past, the present and the future. I have no beginning. I am the greatest creator of the universe.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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