श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d133
 
 
श्लोक  13.14.d133 
श्रीभगवानुवाच
मां न देवा न गन्धर्वा न पिशाचा न राक्षसा:।
विदुस्तत्त्वेन तत्त्वस्थं सूक्ष्मात्मानमवस्थितम्॥
 
 
अनुवाद
भगवान श्री ने कहा - गरुड़! न देवता, न गन्धर्व, न पिशाच, न राक्षस ही मुझे तत्त्वों से जानते हैं। मैं सभी तत्त्वों में सूक्ष्म आत्मा रूप में विद्यमान हूँ।
 
Lord Shri said – Garuda! Neither the gods, nor the Gandharvas, nor the vampires, nor the demons know me from the elements. I am present in all the elements in their subtle soul form.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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