श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d126-d127
 
 
श्लोक  13.14.d126-d127 
नमस्ते भगवन् देव भूतभव्यभवत्प्रभो॥
यदेतदद्भुतं देव मया दृष्टं त्वदाश्रयम्।
अनादिमध्यपर्यन्तं किं तच्छंसितुमर्हसि॥
 
 
अनुवाद
हे भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वामी भगवान नारायणदेव! आपको नमस्कार है। देव! आपके सानिध्य में मैंने जो यह अद्भुत दृश्य देखा है, उसका न आदि है, न मध्य, न अंत। कृपया मुझे बताइए कि यह क्या है।
 
Lord Narayandev, the master of the past, present and future! Salutations to you. Dev! This wonderful sight that I have seen under your supervision has no beginning, middle or end. Please tell me what it is.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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