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mahabharat 13.14.d125: उन अजेय परमेश्वर को बार-बार प्रणाम करके और उनकी ओर देखकर मेरे नेत्र आश्चर्य से चमक उठे और मैंने सिर पर हाथ जोड़कर उन समस्त महापुरुषों में परम उदार और महान पुरुषोत्तम से कहा -   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d125
 
 
श्लोक  13.14.d125 
प्रणिपत्य सुदुर्धर्षं पुन: पुनरुदीक्ष्य च।
शिरस्यञ्जलिमाधाय विस्मयोत्फुल्ललोचन:॥
अवोचं तमदीनार्थं श्रेष्ठानां श्रेष्ठमुत्तमम्।
 
 
अनुवाद
उन अजेय परमेश्वर को बार-बार प्रणाम करके और उनकी ओर देखकर मेरे नेत्र आश्चर्य से चमक उठे और मैंने सिर पर हाथ जोड़कर उन समस्त महापुरुषों में परम उदार और महान पुरुषोत्तम से कहा -
 
Having repeatedly bowed before that invincible Supreme Being and looking at Him, my eyes lit up with wonder and with my hands folded on my head I said to that most generous and great Purushottama amongst all those great men -
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)