श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d122
 
 
श्लोक  13.14.d122 
पुष्पपूरपरिक्षिप्तं धूपितं दीपितं हितम्।
वन्दितं सिक्तसम्मृष्टं नरनारायणाश्रमम्॥
 
 
अनुवाद
नर-नारायण का आश्रम धूप से सुगन्धित और दीपों से प्रकाशित था। चारों ओर ढेर सारे फूल बिखरे हुए थे। वह आश्रम सबके लिए कल्याणकारी था और सज्जनों द्वारा पूजनीय था। उसकी सफाई और जल से सिंचन होता था।
 
Nara-Narayan's ashram was fragrant with incense and illuminated by lamps. There were lots of flowers scattered all around. That ashram was beneficial for everyone and was revered by good people. It was cleaned and watered.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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