श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d121
 
 
श्लोक  13.14.d121 
यजतस्तानृषीन् देवान् वदतो ध्यायतो मुनीन्।
युक्तान् सिद्धान् नैष्ठिकांश्च जपतो यजतो गृहीन्॥
 
 
अनुवाद
वहाँ मैंने ऋषियों को यज्ञ करते, देवताओं को वार्तालाप करते, ऋषियों को ध्यान में लीन, योगी-प्रधान सिद्धों और ब्रह्मचारियों को मंत्रोच्चार करते तथा गृहस्थों को यज्ञ में संलग्न देखा।
 
There I saw Rishis performing Yajnas, Gods conversing, sages engrossed in meditation, the Yogi-oriented Siddhas and celibate monks chanting mantras and the householders engaged in the performance of Yajnas.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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