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mahabharat 13.14.d116: जैसे ही मैंने इस प्रकार स्तुति करने वाले भगवान की स्तुति की, मेरे सारे दुःख दूर हो गए। तभी मुझे किसी अदृश्य शक्ति द्वारा कही गई यह मंगलमय दिव्य वाणी सुनाई दी।   |   mahabharat अध्याय 13.14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.14.d116 
स्तव्यं स्तवं स्तुतवतस्तत् तमो मे प्रणश्यत।
शृणोमि च गिरं दिव्यामन्तर्धानगतां शिवाम्।
 
 
अनुवाद
जैसे ही मैंने इस प्रकार स्तुति करने वाले भगवान की स्तुति की, मेरे सारे दुःख दूर हो गए। तभी मुझे किसी अदृश्य शक्ति द्वारा कही गई यह मंगलमय दिव्य वाणी सुनाई दी।
 
As soon as I praised the praiseworthy God in this manner, all my sorrows vanished. Then I heard this auspicious divine voice spoken by some invisible power.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)