श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d113-d114
 
 
श्लोक  13.14.d113-d114 
तपोब्रह्मनिधानाय युगपर्यायिणे नम:॥
शरणाय शरण्याय शक्तेष्टशरणाय च।
नम: सर्वभवेशाय भूतभव्यभवाय च॥
 
 
अनुवाद
जो तप और वेदों के कोष हैं, जो युगों को एक-एक करके बदलते हैं, जो सबको शरण देने वाले हैं, जो शरणागतों के लिए अभीष्ट शरण हैं, जो शक्तिशाली हैं, जो सम्पूर्ण जगत के अधिष्ठाता हैं तथा जो भूत, वर्तमान और भविष्य के स्वरूप हैं, उन भगवान नारायण को नमस्कार है।
 
Salutations to Lord Narayana, who is the treasure of penance and the Vedas, who changes the ages one by one, who is the giver of shelter to all, who is the desired refuge for those who surrender and is powerful, who is the presiding deity of the entire world and who is the form of past, present and future.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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