श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d112
 
 
श्लोक  13.14.d112 
मुनये ज्वरमुक्ताय ज्वराधिपतये नम:॥
अनेत्राय त्रिनेत्राय पिङ्गलाय विडूर्मिणे।
 
 
अनुवाद
जो ध्यानस्थ ऋषि हैं, ज्वर आदि रोगों से रहित हैं, ज्वर के स्वामी हैं, जिनके नेत्र नहीं हैं अथवा जिनके तीन नेत्र हैं, जो गुलाबी रंग के हैं तथा जो प्रजारूपी तरंगें उत्पन्न करने में समुद्र के समान हैं, उन भगवान विष्णु को नमस्कार है।
 
Salutations to Lord Vishnu who is a meditative sage, free from diseases like fever and the lord of fever, who has no eyes or who has three eyes, who is pinkish in color and is like an ocean in generating waves in the form of people.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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