श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d102
 
 
श्लोक  13.14.d102 
वृषाय वृषरूपाय विभवे भूर्भुवाय च॥
दीप्तसृष्टाय यज्ञाय स्थिराय स्थविराय च।
 
 
अनुवाद
जो वृष (इच्छित वस्तुओं की वर्षा), वृषरूप (धर्मस्वरूप), विभु (व्यापक), भूर्लोक और भुवर्लोक में स्थित हैं, जो तेजस्वी पुरुषों द्वारा किये जाने वाले यज्ञ के स्वरूप हैं, जो स्थिर हैं और जो स्थविरूप (वृद्ध) हैं, उन भगवान को नमस्कार है।
 
Salutations to the Lord who is in the form of Vrisha (shower of desired things), Vrisharupa (form of religion), Vibhu (widespread) and Bhurloka and Bhuvarloka, who is the form of Yagya performed by brilliant men, who is stable and who is sthavirup (aged).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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