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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d100
 
 
श्लोक  13.14.d100 
शिपिविष्टाय सत्याय हरयेऽथ शिखण्डिने।
हुतायोर्ध्वाय वक्त्राय रौद्रानीकाय साधवे॥
सिन्धवे सिन्धुवर्षघ्ने देवानां सिन्धवे नम:।
 
 
अनुवाद
जो शिपिविष्ट (तेज से व्याप्त), सत्य, हरि और शिखंडी (मोर पंख धारण करने वाले श्रीकृष्ण) आदि नामों से प्रसिद्ध हैं, जो हुत (हविष्य को ग्रहण करने वाले अग्नि स्वरूप), ऊर्ध्वमुख, रुद्र की सेना, साधु, सिंधु, समुद्र में वर्षा को ले जाने वाले तथा देवसिंधु (गंगा का स्वरूप) हैं, उन भगवान विष्णु को नमस्कार है।
 
Salutations to Lord Vishnu, who is famous by the names of Shipivishta (pervaded with brightness), Satya, Hari and Shikhandi (Shri Krishna wearing peacock feathers) etc., who is Hut (form of fire that accepts the future), Urdhvamukh, Rudra's army, Sadhu, Sindhu, the one who takes away the rain in the sea and Devsindhu (form of Ganga).
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)