श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 14: ब्रह्माजीका देवताओंसे गरुड-कश्यप-संवादका प्रसंग सुनाना, गरुडजीका ऋषियोंके समाजमें नारायणकी महिमाके सम्बन्धमें अपना अनुभव सुनाना तथा इस प्रसंगके पाठ और श्रवणकी महिमा  »  श्लोक d1
 
 
श्लोक  13.14.d1 
अमृतस्य समुत्पत्तौ देवानामसुरै: सह।
षष्टिवर्षसहस्राणि देवासुरमवर्तत॥
 
 
अनुवाद
एक समय की बात है, जब अमृत कलश उत्पन्न हुआ, तो उसे प्राप्त करने के लिए देवताओं ने दैत्यों से साठ हजार वर्षों तक युद्ध किया। यह युद्ध देवासुर-संग्राम के नाम से प्रसिद्ध है।
 
Once upon a time, when the nectar of nectar was produced, the Gods fought a war with the demons for sixty thousand years to obtain it. This war is famous by the name of Devasur-Sangram.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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