Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 13.139.17: श्रद्धाहीन, नास्तिक, धर्म का नाश करने वाले, क्रूर, तर्क का सहारा लेकर पाप करने वाले, गुरुद्रोही तथा आत्म-अभिमानी मनुष्य को यह धर्म उपदेश नहीं देना चाहिए ॥17॥ | mahabharat अध्याय 13.139: स्कन्ददेवका धर्मसम्बन्धी रहस्य तथा भगवान् विष्णु और भीष्मजीके द्वारा माहात्म्यका वर्णन । mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
नाश्रद्दधानाय न नास्तिकाय
न नष्टधर्माय न निर्घृणाय।
न हेतुदुष्टाय गुरुद्विषे वा
नानात्मभूताय निवेद्यमेतत्॥ १७॥
अनुवाद
श्रद्धाहीन, नास्तिक, धर्म का नाश करने वाले, क्रूर, तर्क का सहारा लेकर पाप करने वाले, गुरुद्रोही तथा आत्म-अभिमानी मनुष्य को यह धर्म उपदेश नहीं देना चाहिए ॥17॥
This religion should not be preached to a person who is devoid of faith, an atheist, a destroyer of religion, a cruel person, a person who resorts to logic and does evil, a traitor to his Guru, or a person who is proud of his own self. ॥17॥
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि स्कन्ददेवरहस्ये चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्याय: ॥ १३४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें स्कन्ददेवका रहस्यविषयक एक सौ चौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १३४॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥