श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 134: लोमशद्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  13.134.3 
असम्भाष्या भवन्त्येते पितॄणां नात्र संशय:।
देवता: पितरश्चैषां नाभिनन्दन्ति तद्धवि:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
इसमें संदेह नहीं कि ये लोग अब अपने पितरों की दृष्टि में बोलने योग्य नहीं रहे और देवता तथा पितर भी उनके तर्पण का आदर नहीं करते। ॥3॥
 
There is no doubt that these people are no longer worthy of being spoken to in the eyes of their ancestors, and the gods and ancestors do not respect their offerings. ॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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