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mahabharat 13.133.8-10h: इसे विधिपूर्वक करने से मनुष्य सुखी और चिंताओं से मुक्त हो जाता है। ब्राह्मण को तीन दिन तक व्रत और एकाग्रचित्त होकर अग्नि में गोमूत्र, गोबर, गोदूध और गोघृत की आहुति देनी चाहिए। एक वर्ष के पश्चात् देवता उसकी पूजा स्वीकार करते हैं और पितर भी श्राद्ध काल में उसके यहां उपस्थित होकर प्रसन्न होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 13.133: वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 133: वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 8-10h
 
 
श्लोक  13.133.8-10h 
यत् कृत्वा तु नर: सम्यक् सुखी भवति विज्वर:।
गवां मूत्रपुरीषेण पयसा च घृतेन च॥ ८॥
अग्निकार्यं त्र्यहं कुर्यान्निराहार: समाहित:।
तत: संवत्सरे पूर्णे प्रतिगृह्णन्ति देवता:॥ ९॥
हृष्यन्ति पितरश्चास्य श्राद्धकाल उपस्थिते।
 
 
अनुवाद
इसे विधिपूर्वक करने से मनुष्य सुखी और चिंताओं से मुक्त हो जाता है। ब्राह्मण को तीन दिन तक व्रत और एकाग्रचित्त होकर अग्नि में गोमूत्र, गोबर, गोदूध और गोघृत की आहुति देनी चाहिए। एक वर्ष के पश्चात् देवता उसकी पूजा स्वीकार करते हैं और पितर भी श्राद्ध काल में उसके यहां उपस्थित होकर प्रसन्न होते हैं।
 
By performing it properly, a person becomes happy and free from worries. A Brahmin should fast and concentrate for three days and offer cow urine, cow dung, cow milk and cow ghee in the fire. After one year, the gods accept his worship and the ancestors also become happy when they are present at his place during the Shraddha period. 8-9 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)