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श्लोक 13.133.10-11  |
एष ह्यधर्मो धर्मश्च सरहस्य: प्रकीर्तित:॥ १०॥
मर्त्यानां स्वर्गकामानां प्रेत्य स्वर्गसुखावह:॥ ११॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार मैंने धर्म और अधर्म का रहस्य सहित वर्णन किया है। इससे स्वर्ग की इच्छा रखने वालों को मृत्यु के बाद स्वर्गीय सुख प्राप्त करने में सहायता मिलेगी। |
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| In this way I described Dharma and Adharma along with their secrets. It will help the people who wish for heaven to attain heavenly happiness after death. |
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इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि देवरहस्ये अष्टाविंशत्यधिकशततमोऽध्याय:॥ १२८॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें देवताओंका रहस्यविषयक एक सौ अट्ठाईसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ १२८॥
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