श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 133: वायुके द्वारा धर्माधर्मके रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.133.1 
वायुरुवाच
किंचिद् धर्मं प्रवक्ष्यामि मानुषाणां सुखावहम्।
सरहस्याश्च ये दोषास्तान् शृणुध्वं समाहिता:॥ १॥
 
 
अनुवाद
वायुदेव बोले, "मैं मनुष्यों को प्रिय लगने वाले धर्म का थोड़ा-सा वर्णन करूँगा तथा उसके रहस्यों सहित दोषों को भी तुम लोगों को बताऊँगा। तुम सब लोग एकाग्रचित्त होकर सुनो।" ॥1॥
 
Vayu Deva said, "I will describe a little of the Dharma which is pleasing to human beings and will also tell you about the defects along with their secrets. All of you listen with concentration." ॥1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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