श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 132: अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 6-7
 
 
श्लोक  13.132.6-7 
श्रीरुवाच
प्रकीर्णं भाजनं यत्र भिन्नभाण्डमथासनम्।
योषितश्चैव हन्यन्ते कश्मलोपहते गृहे॥ ६॥
देवता: पितरश्चैव उत्सवे पर्वणीषु वा।
निराशा: प्रतिगच्छन्ति कश्मलोपहताद् गृहात्॥ ७॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मी बोलीं - जिस घर में सारे बर्तन इधर-उधर बिखरे पड़े हों, जहाँ बर्तन टूटे-फूटे हों और चटाई फटी हुई हो तथा जहाँ स्त्रियों को मारा-पीटा जाता हो, वह घर पाप के कारण अपवित्र है। पाप से अपवित्र उस घर से, पर्व-त्योहारों और उत्सवों के अवसर पर देवता और पितर निराश होकर लौट जाते हैं - उस घर की पूजा स्वीकार नहीं करते। 6-7।
 
Lakshmi said - The house where all the utensils are scattered here and there, where utensils are broken and mats are torn and where women are beaten, that house is polluted due to sin. From that house polluted by sin, on the occasions of festivals and celebrations, the gods and ancestors return disappointed - they do not accept the worship of that house. 6-7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)