श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 132: अग्नि, लक्ष्मी, अंगिरा, गार्ग्य, धौम्य तथा जमदग्निके द्वारा धर्मके रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  13.132.11 
अपि क्रतुशतैरिष्ट्वा क्षयं गच्छति तद्धवि:।
न तु क्षीयन्ति ते धर्मा: श्रद्दधानै: प्रयोजिता:॥ ११॥
 
 
अनुवाद
सैकड़ों बार किये गये यज्ञ का फल क्षीण हो जाता है; किन्तु यदि धर्मात्मा पुरुष उपर्युक्त धर्म का पालन करते हैं, तो वह कभी क्षीण नहीं होता ॥11॥
 
The fruits of a sacrifice performed hundreds of times get diminished; however, if the above-mentioned Dharma is followed by devout men, it never gets diminished. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)