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mahabharat 13.131.48-49: पौष मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की रात्रि में जब रोहिणी नक्षत्र हो, उस समय मनुष्य को स्नान करके शुद्ध हो जाना चाहिए और फिर एक वस्त्र पहनकर खुले मैदान में आकाश के नीचे श्रद्धा और एकाग्रता के साथ शयन करना चाहिए तथा चन्द्रमा की किरणों का सेवन करते रहना चाहिए। ऐसा करने से उसे महान यज्ञ का फल प्राप्त होता है। ॥48-49॥   |   mahabharat अध्याय 13.131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 48-49
 
 
श्लोक  13.131.48-49 
पौषमासस्य शुक्ले वै यदा युज्येत रोहिणी।
तेन नक्षत्रयोगेन आकाशशयनो भवेत्॥ ४८॥
एकवस्त्र: शुचि: स्नात: श्रद्दधान: समाहित:।
सोमस्य रश्मय: पीत्वा महायज्ञफलं लभेत्॥ ४९॥
 
 
अनुवाद
पौष मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा की रात्रि में जब रोहिणी नक्षत्र हो, उस समय मनुष्य को स्नान करके शुद्ध हो जाना चाहिए और फिर एक वस्त्र पहनकर खुले मैदान में आकाश के नीचे श्रद्धा और एकाग्रता के साथ शयन करना चाहिए तथा चन्द्रमा की किरणों का सेवन करते रहना चाहिए। ऐसा करने से उसे महान यज्ञ का फल प्राप्त होता है। ॥48-49॥
 
On the night of the day of the bright half of Paush month when the Rohini nakshatra is present, a person should purify himself by taking a bath and then wearing one piece of cloth should sleep in an open field under the sky with faith and concentration and should keep on drinking the rays of the moon. By doing so he gets the fruits of a great yajna. ॥48-49॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)