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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  13.131.47 
श्रृूयतां सर्वमाख्यास्ये निखिलेन तपोधना:।
यथा यज्ञफलं मर्त्यो लभते नात्र संशय:॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
हे तपस्वियों! मैं तुम्हें पूर्ण विस्तार से बताता हूँ कि मनुष्य किस प्रकार निःसंदेह यज्ञ का फल प्राप्त करता है। सुनो।
 
O ascetics! I will tell you in full detail how a man receives the fruits of a yagya without any doubt. Listen.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)