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श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 44-45
 
 
श्लोक  13.131.44-45 
द्रव्यहीना: कथं मर्त्या दरिद्रा: साधुवर्तिन:॥ ४४॥
प्राप्नुवन्तीह यज्ञस्य फलं केन च कर्मणा।
एतच्छ्रुत्वा वचस्तेषां ब्रह्मा वचनमब्रवीत्॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! इस संसार में पुण्यात्मा लोग प्रायः दरिद्र और दीन-हीन होते हैं। वे यहाँ किस कर्म से और किस प्रकार यज्ञ का फल प्राप्त कर सकते हैं?' यह सुनकर ब्रह्माजी बोले।
 
Lord! In this world, virtuous people are generally poor and destitute. By what deeds and how can they get the fruits of sacrifice here?' Hearing this, Brahmaji said. 44-45.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)