श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 41
 
 
श्लोक  13.131.41 
एतं हि मन्त्रं त्रिदशाभिजुष्टं
पठेत य: पर्वसु गोष्ठमध्ये।
न तस्य पापं न भयं न शोक:
सहस्रनेत्रस्य च याति लोकम्॥ ४१॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य पर्व के दिन गोशाला में इस मन्त्र का पाठ करता है, वह न तो पाप करता है, न भयभीत होता है, न शोक का अनुभव करता है। वह सहस्त्र नेत्रों वाले इन्द्र के लोक में जाता है ॥41॥
 
He who recites this mantra in the cowshed on the day of the festival, neither commits any sin, nor is afraid, nor experiences any sorrow. He goes to the world of the thousand-eyed Indra. ॥ 41॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas