श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 33-34
 
 
श्लोक  13.131.33-34 
तस्माद् गावो न पादेन स्प्रष्टव्या वै कदाचन।
ब्राह्मणश्च महातेजा दीप्यमानस्तथानल:॥ ३३॥
श्रद्दधानेन मर्त्येन आत्मनो हितमिच्छता।
एते दोषा मया प्रोक्तास्त्रिषु य: पादमुत्सृजेत्॥ ३४॥
 
 
अनुवाद
अतः जो भक्त अपना कल्याण चाहता है, उसे चाहिए कि वह गौओं, महाप्रतापी ब्राह्मणों तथा जलती हुई अग्नि को अपने पैरों से कभी न छुए। इन तीनों को छूने वाले मनुष्य को जो पाप लगते हैं, उनका वर्णन मैंने किया है ॥33-34॥
 
Therefore, a devotee who seeks his own welfare should never touch cows, a very illustrious Brahmin or a burning fire with his feet. I have described the sins that a person who touches these three things will incur. ॥33-34॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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