श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 30-31
 
 
श्लोक  13.131.30-31 
दिवं स्पृशत्यशब्दोऽस्य त्रस्यन्ति पितरश्च वै॥ ३०॥
वैमनस्यं च देवानां कृतं भवति पुष्कलम्।
पावकश्च महातेजा हव्यं न प्रतिगृह्णति॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
ऐसे पुरुष की अपकीर्ति स्वर्ग तक फैल जाती है। उसके पितर भयभीत हो जाते हैं। देवता भी उससे बहुत द्वेष रखते हैं और महाबली पावक भी उसके द्वारा दी गई भेंट स्वीकार नहीं करते ॥30-31॥
 
The infamy of such a person spreads up to heaven. His ancestors become afraid. Even the gods develop a lot of animosity towards him and the mighty Pavakas do not accept the offerings given by him. ॥30-31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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