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mahabharat 13.131.22-23: व्रत का संकल्प लेने तथा पूजा-अनुष्ठान के लिए ताँबे का पात्र सर्वोत्तम माना गया है। पितरों के लिए पूजन सामग्री, दान, तर्पण तथा तिल मिश्रित जल ताँबे के पात्र से ही देना चाहिए, अन्यथा उसका फल बहुत कम मिलता है। यह अत्यन्त गोपनीय बात है। इसके अनुसार आचरण करने से देवता संतुष्ट होते हैं।॥22-23॥   |   mahabharat अध्याय 13.131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 22-23
 
 
श्लोक  13.131.22-23 
उपवासे बलौ चापि ताम्रपात्रं विशिष्यते।
बलिर्भिक्षा तथार्घ्यं च पितॄणां च तिलोदकम्॥ २२॥
ताम्रपात्रेण दातव्यमन्यथाल्पफलं भवेत्।
गुह्यमेतत् समुद्दिष्टं यथा तुष्यन्ति देवता:॥ २३॥
 
 
अनुवाद
व्रत का संकल्प लेने तथा पूजा-अनुष्ठान के लिए ताँबे का पात्र सर्वोत्तम माना गया है। पितरों के लिए पूजन सामग्री, दान, तर्पण तथा तिल मिश्रित जल ताँबे के पात्र से ही देना चाहिए, अन्यथा उसका फल बहुत कम मिलता है। यह अत्यन्त गोपनीय बात है। इसके अनुसार आचरण करने से देवता संतुष्ट होते हैं।॥22-23॥
 
Copper vessels are considered to be the best for taking a vow of fasting and offering worship rituals. Worship materials, alms, offerings and water mixed with sesame seeds for ancestors should be given through copper vessels, otherwise their results are very little. This is a very confidential matter. By acting according to this, the gods are satisfied.॥22-23॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)