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mahabharat 13.131.1: भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर ! प्राचीन काल की कथा है, एक बार देवराज इन्द्र ने भगवान विष्णु से पूछा - 'प्रभो ! आप किन कर्मों से सुखी होते हैं ? किस प्रकार से आप संतुष्ट हो सकते हैं ?' सुरेन्द्र के ऐसा पूछने पर भगवान विष्णु ने कहा - ॥1॥   |   mahabharat अध्याय 13.131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 131: विष्णु, बलदेव, देवगण, धर्म, अग्नि, विश्वामित्र, गोसमुदाय और ब्रह्माजीके द्वारा धर्मके गूढ़ रहस्यका वर्णन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  13.131.1 
भीष्म उवाच
केन ते च भवेत् प्रीति: कथं तुष्टिं तु गच्छसि।
इति पृष्ट: सुरेन्द्रेण प्रोवाच हरिरीश्वर:॥ १॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - युधिष्ठिर ! प्राचीन काल की कथा है, एक बार देवराज इन्द्र ने भगवान विष्णु से पूछा - 'प्रभो ! आप किन कर्मों से सुखी होते हैं ? किस प्रकार से आप संतुष्ट हो सकते हैं ?' सुरेन्द्र के ऐसा पूछने पर भगवान विष्णु ने कहा - ॥1॥
 
Bhishma says - Yudhishthir! It is a story of ancient times, once Devraj Indra asked Lord Vishnu - 'Lord! By which deeds do you become happy? In what way can you be satisfied?' When Surendra asked this, Lord Vishnu said - ॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)