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mahabharat 13.130.83: उसकी प्रजा सदैव स्वस्थ और बलवान रहती है। श्राद्ध का फल कुल और वंश की वृद्धि है। यह फल पिंडदान करने वालों को सहज ही प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध करता है, वह उनके ऋण से मुक्त हो जाता है। 83.   |   mahabharat अध्याय 13.130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद  »  श्लोक 83
 
 
श्लोक  13.130.83 
हृष्टपुष्टमनास्तेषां प्रजा भवति नित्यदा।
कुलवंशस्य वृद्धिस्तु पिण्डदस्य फलं भवेत्।
श्रद्दधानस्तु य: कुर्यात् पितॄणामनृणो भवेत्॥ ८३॥
 
 
अनुवाद
उसकी प्रजा सदैव स्वस्थ और बलवान रहती है। श्राद्ध का फल कुल और वंश की वृद्धि है। यह फल पिंडदान करने वालों को सहज ही प्राप्त हो जाता है। जो व्यक्ति श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का श्राद्ध करता है, वह उनके ऋण से मुक्त हो जाता है। 83.
 
His subjects are always healthy and strong-minded. The fruit of Shraddha is the growth of the family and lineage. This fruit is easily available to those who offer Pinddan. He who performs Shraddha of his ancestors with devotion, gets rid of their debt. 83.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)