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mahabharat 13.130.56-57: जो मनुष्य ग्रीष्मकाल या शीतकाल में सूर्य की किरणों से तपता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। पापों से मुक्त मनुष्य शाश्वत तेज को प्राप्त करता है। अपने तेज से वह सूर्य के समान चमकता है और चन्द्रमा के समान प्रकाशित होता है।॥ 56-57॥   |   mahabharat अध्याय 13.130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद  »  श्लोक 56-57
 
 
श्लोक  13.130.56-57 
रश्मिभिस्तापितोऽर्कस्य सर्वपापमपोहति।
ग्रीष्मकालेऽथ वा शीते एवं पापमपोहति॥ ५६॥
तत: पापात् प्रमुक्तस्य द्युतिर्भवति शाश्वती।
तेजसा सूर्यवद् दीप्तो भ्राजते सोमवत् पुन:॥ ५७॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य ग्रीष्मकाल या शीतकाल में सूर्य की किरणों से तपता है, उसके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। इस प्रकार मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है। पापों से मुक्त मनुष्य शाश्वत तेज को प्राप्त करता है। अपने तेज से वह सूर्य के समान चमकता है और चन्द्रमा के समान प्रकाशित होता है।॥ 56-57॥
 
‘He who is warmed by the rays of the sun in summer or winter, destroys all his sins. In this way man becomes free from sins. A man free from sins attains eternal radiance. With his brilliance he shines like the sun and shines like the moon.’॥ 56-57॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)