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mahabharat 13.130.54-55: जो मनुष्य भोजन करने से पहले पर्वत पर चढ़कर दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक पैर पर खड़ा होता है और अग्निदेव को देखता है, वह महान तप सहित व्रत का फल प्राप्त करता है ॥ 54-55॥   |   mahabharat अध्याय 13.130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद  »  श्लोक 54-55
 
 
श्लोक  13.130.54-55 
पर्वतारोहणं कृत्वा एकपादो विभावसुम्॥ ५४॥
निरीक्षेत निराहार ऊर्ध्वबाहु: कृताञ्जलि:।
तपसा महता युक्त उपवासफलं लभेत्॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य भोजन करने से पहले पर्वत पर चढ़कर दोनों हाथ ऊपर उठाकर एक पैर पर खड़ा होता है और अग्निदेव को देखता है, वह महान तप सहित व्रत का फल प्राप्त करता है ॥ 54-55॥
 
He who climbs a mountain and stands on one leg with both arms raised and folded hands before eating and looks at Agnidev (fire-god) there, attains the fruit of fasting accompanied by great austerity. ॥ 54-55॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)