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mahabharat 13.130.3: वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यशस्वी पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर भीष्मजी उन्हें धर्म का अत्यन्त गुह्य रहस्य बताने लगे॥3॥   |   mahabharat अध्याय 13.130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  13.130.3 
वैशम्पायन उवाच
एवं पृष्टो नरेन्द्रेण पाण्डवेन यशस्विना।
धर्माणां परमं गुह्यं भीष्म: प्रोवाच पार्थिवम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! यशस्वी पाण्डुपुत्र महाराज युधिष्ठिर के इस प्रकार पूछने पर भीष्मजी उन्हें धर्म का अत्यन्त गुह्य रहस्य बताने लगे॥3॥
 
Vaishampayanji says – Janamejaya! When the famous Pandu's son Maharaj Yudhishthira asked this, Bhishmaji started telling him the most secret secret of religion. 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)