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mahabharat 13.130.27-28h: यह श्राद्ध करने की विधि है, जिसका पालन करने से धर्म का कभी क्षय नहीं होता। इस धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति के पूर्वज सदैव प्रसन्न और संतुष्ट रहते हैं। उसकी वंश वृद्धि होती है, कभी क्षीण नहीं होती। 27 1/2।   |   mahabharat अध्याय 13.130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद  »  श्लोक 27-28h
 
 
श्लोक  13.130.27-28h 
एष श्राद्धविधि: प्रोक्तो यथा धर्मो न लुप्यते।
पितरस्तस्य तुष्यन्ति प्रहृष्टमनस: सदा॥ २७॥
प्रजा विवर्धते चास्य अक्षयं चोपतिष्ठति।
 
 
अनुवाद
यह श्राद्ध करने की विधि है, जिसका पालन करने से धर्म का कभी क्षय नहीं होता। इस धर्म का पालन करने वाले व्यक्ति के पूर्वज सदैव प्रसन्न और संतुष्ट रहते हैं। उसकी वंश वृद्धि होती है, कभी क्षीण नहीं होती। 27 1/2।
 
This is the method of performing Shraddha, by following which the religion is never lost. The ancestors of the person who follows this religion are always happy and satisfied. His progeny increases and never diminishes. 27 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)