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mahabharat 13.130.15: जो मनुष्य अतिथियों का पूजन करता है, उसे गौदान, तीर्थस्थानों के दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों का फल प्राप्त होता है ॥15॥   |   mahabharat अध्याय 13.130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद   ।   mahabharat पर्व 13: अनुशासन पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 130: श्राद्धके विषयमें देवदूत और पितरोंका, पापोंसे छूटनेके विषयमें महर्षि विद्युत्प्रभ और इन्द्रका, धर्मके विषयमें इन्द्र और बृहस्पतिका तथा वृषोत्सर्ग आदिके विषयमें देवताओं, ऋषियों और पितरोंका संवाद  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  13.130.15 
गवां फलं तीर्थफलं यज्ञानां चैव यत् फलम्।
एतत् फलमवाप्नोति यो नरोऽतिथिपूजक:॥ १५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य अतिथियों का पूजन करता है, उसे गौदान, तीर्थस्थानों के दर्शन और धार्मिक अनुष्ठानों का फल प्राप्त होता है ॥15॥
 
A person who worships guests obtains the benefits of donating cows, visiting holy places and performing religious ceremonies. ॥ 15॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)