श्री महाभारत  »  पर्व 13: अनुशासन पर्व  »  अध्याय 129: नारदका पुण्डरीकको भगवान‍् नारायणकी आराधनाका उपदेश तथा उन्हें भगवद्धामकी प्राप्ति, सामगुणकी प्रशंसा, ब्राह्मणका राक्षसके सफेद और दुर्बल होनेका कारण बताना  »  श्लोक d5
 
 
श्लोक  13.129.d5 
नारद उवाच
शृणुष्वावहितस्तात ज्ञानयोगमनुत्तमम्।
अप्रभूतं प्रभूतार्थं वेदशास्त्रार्थसारकम्॥
 
 
अनुवाद
नारदजी बोले- पिताश्री! सावधान होकर परम उत्तम ज्ञानयोग का वर्णन सुनिए। यह किसी व्यक्ति विशेष द्वारा प्रकट नहीं किया गया है। यह सनातन है, प्रचुर अर्थ का स्रोत है तथा वेदों और शास्त्रों के अर्थ का सार है।
 
Naradji said- Father! Be careful and listen to the description of the most excellent Gyanyoga. It has not been revealed by any particular person. It is eternal, it is a source of abundant meaning and it is the essence of the meaning of Vedas and scriptures.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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